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मुस्लिमो के बीच संघर्ष के लिए कुछ भी तो नही था जिसके विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन चलाया गया था और गांधीजी ने अपने अनुयायियों से यह प्रतिज्ञा लेने के लिए कहा ।इससे पता चलता है कि वे शुरू से ही हिंदू-मुस्लिम एकता पर कितना जोर देते थे।
मुसलमानो द्वरा शुरू इस आंदोलन की कमान जिस दृढ़ निश्चय और आस्था से गांधीजी ने हाथों में ली उससे बहुत से मुसलमान स्वयं भी आश्चर्यचकित रह गए थे। उनके लोगो ने खिलाफत आंदोलन की नैतिकता के बारे में संदेह प्रकट किया और गांधीजी को इस आंदोलन से अलग रहने के लिए कहा गया क्योंकि इसका नैतिक आधार ही संदेहास्पद था। परंतु गांधीजी ने स्वयं खिलाफत आंदोलन को इतना न्यायपूर्ण मानने के कारण इस सलाह को मानने से इनकार कर दिया। गांधीजी ने कई बार तर्क दिए कि यह आंदोलन न्यायसगत है और इसमें शामिल होना उनका कर्तव्य है । इस संबंध में माननीय गांधी का पक्ष उनके शब्दो — मे इस प्रकार है 👇
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