जाति जनगणना

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‘जाति जनगणना’ – डॉ. लक्ष्मण यादव 

  1. ‘जाति जनगणना’ केवल जनगणना पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की पूरी बहस पर आधारित पुस्तक है।
  2. लेखक ने जाति जनगणना को प्रतिनिधित्व, संसाधनों और लोकतंत्र से जोड़कर समझाया है।
  3. पुस्तक इतिहास, राजनीति और समाजशास्त्र का संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
  4. इसमें फुले, शाहू, आंबेडकर, मंडल आयोग और बहुजन आंदोलनों की भूमिका का उल्लेख है।
  5. लेखक बताते हैं कि बिना सही आँकड़ों के समानता की नीतियाँ अधूरी रहती हैं।
  6. पुस्तक जाति जनगणना के पक्ष और उससे जुड़े भ्रमों का तार्किक उत्तर देती है।
  7. इसकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और आम पाठकों के लिए उपयुक्त है।
  8. तथ्य और तर्क मिलकर विषय को गंभीरता प्रदान करते हैं।
  9. यह पुस्तक केवल राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को समझने का माध्यम बनती है।
  10. लेखक ने कठिन विषय को सहज शैली में प्रस्तुत किया है।
  11. पुस्तक बहुजन विमर्श और सामाजिक न्याय के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है।
  12. शोधपरक सामग्री होने के बावजूद इसे पढ़ना बोझिल नहीं लगता।
  13. यह पाठक को स्थापित धारणाओं पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
  14. समकालीन भारत में जाति जनगणना की प्रासंगिकता को प्रभावी ढंग से सामने लाती है।
  15. सामाजिक न्याय के प्रश्नों को समझने के इच्छुक प्रत्येक पाठक के लिए यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।

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Description

 

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Weight 299 g

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